केरल की टेक्नोलॉजी से बना शिप
अहमदाबाद, 30 दिसंबर, 2025
नेवी शिप INSB कौंडिन्य को भारत की 2 हज़ार साल पुरानी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके बनाया गया है। गुजरात के पोरबंदर से ओमान के मस्कट तक पहली यात्रा की घोषणा 29 दिसंबर, 2025 को की गई थी, जिसमें 1,400 किलोमीटर (750 नॉटिकल मील) की दूरी तय की जाएगी। इसका नाम नाविक ‘कौंडिन्य’ के नाम पर रखा गया है। इसका मतलब पुराने समय का ऋषि भी होता है।
गुजरात को 5 हज़ार साल पहले शिप बनाने का ज्ञान था। 5 हज़ार साल पहले गुजरात के बंदरगाहों से व्यापार होता था। लेकिन उस ज्ञान का इस्तेमाल नहीं हुआ, बल्कि केरल की रस्सी से बनी शिप बनाने की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हुआ है।
गुजरात का शिप
शिप बनाने का सबसे पुराना ज्ञान गुजरात के लोथल के पास था।
दुनिया का सबसे पुराना हड़प्पा बंदरगाह लोथल है, जो 2500 BCE का है। यह वह जगह थी जहाँ बड़े जहाज़ आते थे। 5 हज़ार साल तक पुराने लोथल पोर्ट से मेसोपोटामिया के साथ व्यापार होता था।
पुराने गुजरात में जहाज़ बनाने और नाव बनाने की इंडस्ट्री बहुत अच्छी थी। पुराने पर्शिया में जहाज़ बनाने के लिए सागौन की लकड़ी एक्सपोर्ट की जाती थी। ढाका में पानी का एंट्री गेट उत्तर की तरफ़ से और एग्ज़िट गेट दक्षिण की तरफ़ से बनाया गया है। पानी के आने-जाने के लिए दोनों तरफ़ गैप रखे गए हैं।
पानी निकलने के रास्तों को लकड़ी के तख्तों से बंद कर दिया गया था, ताकि जहाज़ के लिए ज़रूरी पानी बना रहे।
शहर में जहाज़ों को एंकर करने और सामान चढ़ाने-उतारने के लिए एक डॉक था। हड़प्पा कल्चर के जहाज़ों या बड़ी नावों का तला चपटा होता था। उन्हें ज्वार के समय लोथल लाया जाता था। लोथल के लोग जहाज़ से भारत के दूसरे इलाकों के साथ व्यापार करते थे।
गोवा की कंपनी
गोवा की M/s होडी इनोवेशंस ने केरल के कुशल कारीगरों की लीडरशिप में यह जहाज़ बनाया है। यह समुद्री परंपरा और समुद्री व्यापार की रिच मिसाल है। गोवा की एक कंपनी ने लगभग 2000 साल पुराने ‘टंका’ तरीके से यह जहाज बनाया है। हाथ से सिले हुए जोड़ पूरी तरह से पारंपरिक तरीकों और कच्चे माल का इस्तेमाल करके केरल के कुशल कारीगरों ने बनाए हैं, जिसका नेतृत्व मास्टर शिपराइट बाबू शंकरन कर रहे हैं।

भारत के अलावा दुनिया के किसी और देश के पास ऐसा जहाज नहीं है। जो पालों में हवा से चलता है, इसे बनाने में किसी भी तरह की कील का इस्तेमाल नहीं किया गया है। 2000 साल पुराने ‘टंका’ तरीके का इस्तेमाल किया गया है। यह नारियल की रस्सी से सिले हुए लकड़ी के तख्तों से बना है। लकड़ी के तख्तों को नारियल के रेशे की रस्सी से एक साथ सिला गया था। जहाज में लोहे की कीलों का इस्तेमाल नहीं किया गया। इसे प्राकृतिक चीज़ों और पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करके बनाया गया है।
केरल के कारीगरों ने इसे बनाने का काम किया। इसे मशहूर शिपबिल्डर बाबू शंकरन ने बनाया है। हज़ारों जोड़ हाथ से सिले गए हैं। जहाज का कोई पिछला डिज़ाइन या स्ट्रक्चर नहीं बचा है, इसलिए इसकी पूरी आउटलाइन अजंता पेंटिंग का इस्तेमाल करके तैयार की गई थी। इसे फरवरी 2025 में गोवा के होडी शिपयार्ड में लॉन्च किया गया था। इसमें कोई इंजन या मॉडर्न GPS सिस्टम नहीं है। इसमें सिर्फ़ चौकोर कॉटन सेल और पैडल हैं। कंपास दिशा तय करता है। यह पूरी तरह से विंड एनर्जी से चलता है। लकड़ी के पार्ट्स और ट्रेडिशनल स्टीयरिंग मैकेनिज्म से बना यह शिप दुनिया की किसी भी नेवी में मौजूद किसी भी शिप से अलग और अनोखा है।
कपड़े के सेल इस्तेमाल किए गए हैं। मैनेजमेंट में हालेसा का इस्तेमाल किया गया है। पहले लेग में यह गुजरात से ओमान तक जाएगा, यानी यह सफर 15 दिन का होगा और इसमें 13 सेलर्स और 3 ऑफिसर होंगे। नेवी इस शिप को पुराने समुद्री रास्तों पर ऑपरेट करेगी। अभी किसी को भी ऐसे शिप को ऑपरेट करने का एक्सपीरियंस नहीं है। जिसके चलते क्रू मेंबर्स को 6 महीने की स्पेशल ट्रेनिंग दी गई।
65 फीट लंबा, 22 फीट चौड़ा, 13 फीट ऊंचा और इसका वजन 50 टन है। यह भारत के समुद्री व्यापार के हज़ार साल पुराने इतिहास को दिखाता है। केंद्र सरकार ने 2023 में इस प्रोजेक्ट को मंज़ूरी दी थी, जिसका मकसद दुनिया को भारत के पुराने जहाज़ बनाने के हुनर को दिखाना था।
चौकोर सूती पाल और पतवार की जगह अब स्टीयरिंग बोर्ड लगा है, जिसका इस्तेमाल पतवार के आविष्कार से पहले जहाज़ को कंट्रोल करने के लिए किया जाता था। जहाज़ के पाल पर गंडाबेरुंडा (एक पौराणिक पक्षी) और सूरज की आकृतियाँ बनी हैं, जबकि इसके आगे के हिस्से में बना शेर और हड़प्पा-शैली का पत्थर का लंगर इसकी पुरानी पहचान को और मज़बूत करते हैं। यह अजंता की गुफाओं की एक पेंटिंग से प्रेरित था। यह हमारे आज के जहाज़ बनाने के इतिहास में एक अनोखी कामयाबी है।
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