प्रोडक्शन को गंभीर झटका, कीमतें बढ़ीं तो महंगाई भी बढ़ेगी
दिलीप पटेल
अहमदाबाद, 26 जून, 2026
अल नीनो भारत के 30 हजार करोड़ रुपये के बारिश पर निर्भर खेती के प्रोडक्ट्स के लिए खतरा है। अगर गुजरात का 5 परसेंट हिस्सा मानें तो 1500 करोड़ रुपये के खेती के प्रोडक्ट्स के लिए खतरा है।
गुजरात के 56 लाख किसानों में से कम से कम 30 लाख किसानों की परेशानी बढ़ सकती है। खेती के प्रोडक्ट्स का प्रोडक्शन कम होने से खेती के प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ेंगे, इसलिए महंगाई की संभावना है।
कम बारिश की ऐसी स्थिति 11 साल बाद बनी है।
मॉनसून 15 जून से शुरू होता है। लेकिन मॉनसून की धीमी रफ्तार और अल नीनो के असर ने खरीफ सीजन की बुआई पर असर डाला है। इससे मूंगफली, कपास, सोयाबीन, गन्ना, दालें और खाने के तेल जैसी मुख्य फसलों के प्रोडक्शन पर असर पड़ सकता है। ऐसी संभावना है कि कम बारिश की वजह से खाने-पीने की चीज़ों के दाम बढ़ेंगे और खेती के सामान की सप्लाई कम हो जाएगी।
सिंचाई से खेती
22 जून 2026 तक गुजरात में कुल 9 परसेंट खेती सिंचाई पर आधारित है। जिसमें कुआं, तालाब और बांध पर आधारित खेती शामिल है।
सरकार का दावा है कि नर्मदा से पानी दिया जा रहा है। अगर ऐसा है तो 18 लाख हेक्टेयर तक पानी पहुंच जाना चाहिए था। लेकिन 1 परसेंट यानी 1800 हेक्टेयर में भी नर्मदा के पानी से पहले बुआई होने का पता नहीं है।
कुल 85 लाख हेक्टेयर खेतों में बुआई होनी चाहिए थी लेकिन सिर्फ 7 लाख 67 हजार हेक्टेयर में बुआई हुई है। जो 9 परसेंट है। पिछले साल 22 जून 2025 तक 18 लाख 30 हजार हेक्टेयर में बुआई हुई थी।
कुल बुआई वाले एरिया में से सौराष्ट्र में 5 लाख हेक्टेयर, नॉर्थ गुजरात में 1 लाख 40 हज़ार हेक्टेयर, सेंट्रल गुजरात में 47 हज़ार हेक्टेयर और साउथ गुजरात में 7 लाख 67 हज़ार हेक्टेयर में बुआई हो चुकी है।
बोरवेल इरिगेशन की एडवांस बुआई हो चुकी है, जिसमें मूंगफली 2 लाख 39 हज़ार हेक्टेयर, कॉटन 4 लाख 38 हज़ार हेक्टेयर है। सब्ज़ियाँ 30 हज़ार हेक्टेयर, चारा 45 हज़ार हेक्टेयर है।
ब्लूमबर्ग के मुताबिक, इससे भारत की एग्रीकल्चरल इकॉनमी पर 30 हज़ार करोड़ रुपये का असर पड़ सकता है।
मॉनसून की धीमी रफ़्तार का असर खरीफ सीजन की बुआई पर पड़ने लगा है। जून का महीना धान, कॉटन, सोयाबीन और बाजरा जैसी खरीफ फसलों की बुआई के लिए अहम माना जाता है। लेकिन बड़े हिस्सों में बारिश में देरी के कारण किसान अभी भी बारिश का इंतज़ार कर रहे हैं।
इस मॉनसून में यह कमी ऐसे समय में आई है जब।
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रशांत महासागर में बन रहा एल नीनो आने वाले महीनों में भारत के मॉनसून को और कमजोर कर सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे न सिर्फ खरीफ फसल के प्रोडक्शन पर असर पड़ने का खतरा बढ़ेगा, बल्कि खाने का तेल, चीनी, कपास और दालों जैसी ज़रूरी खेती की चीज़ों की कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है। इससे महंगाई पर भी असर पड़ने की उम्मीद है।
मॉनसून की देर से बुआई का असर
भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून आमतौर पर जून की बारिश पर आधारित होता है, जो खरीफ फसलों की बुआई के कैलेंडर का आधार है। मुंबई में मॉनसून के आने में करीब दो हफ्ते की देरी हुई, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।
खरीफ फसलों की बुआई के लिए जून एक अहम समय होता है। किसान पहली अच्छी बारिश के बाद ही बुआई शुरू करते हैं। इस वजह से, जून के आखिरी हफ्ते तक कई इलाकों में अच्छी बारिश की कमी से खेती पर असर पड़ रहा है।
ब्लूमबर्ग के मुताबिक, सूखे जैसी स्थिति सबसे ज़्यादा मध्य भारत और दक्कन इलाके में महसूस की जा रही है। इनमें राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना जैसे खेती वाले बड़े इलाके शामिल हैं। इन इलाकों में देश का लगभग 90 परसेंट सोयाबीन और गन्ना, 80 परसेंट कॉटन और 70 परसेंट मूंगफली और दालें, जैसे मसूर और छोले पैदा होते हैं। ये राज्य फल और सब्ज़ियों की खेती में भी अहम भूमिका निभाते हैं, जिसका असर देश भर के एग्रीकल्चरल मार्केट पर पड़ता है।
नासिक में नॉर्मल से काफी कम बारिश होती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि महाराष्ट्र के नासिक में कमजोर मॉनसून सीजन की वजह से अगस्त और सितंबर में प्याज की कीमतों में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई। नासिक में जून में अब तक नॉर्मल बारिश का सिर्फ़ 16 परसेंट ही हुआ है।
एल नीनो मॉनसून को और कमज़ोर कर सकता है।
साइंटिस्ट अभी तक भारतीय मॉनसून पर असर डालने वाले सभी फैक्टर्स को पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं। इसलिए, मॉनसून में देरी के लिए अकेला एल नीनो ज़िम्मेदार नहीं हो सकता है। हालांकि, जैसे-जैसे साल आगे बढ़ेगा, एल नीनो का असर बढ़ने की संभावना है। रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पिछले 11 सालों में सबसे कमज़ोर मॉनसून आ सकता है। देर से बोई गई फसलों को भी कम बारिश और सूखे जैसे हालात का सामना करना पड़ सकता है।
महंगाई पर असर
भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपने आर्थिक अनुमानों में खराब मौसम को एक बड़ा रिस्क बताया है।
एक्सपोर्ट पर रोक
2023 में खराब मॉनसून और बाढ़ के बाद, केंद्र सरकार ने घरेलू बाज़ार में कीमतों को कंट्रोल करने के लिए चावल के एक्सपोर्ट पर रोक लगा दी। दुनिया भर में चावल के व्यापार में भारत का हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत है। अगर मौसम की मौजूदा हालत ऐसी ही बनी रही, तो चीनी के एक्सपोर्ट पर भी नई रोक लगाई जा सकती है।
एग्रीकल्चर सिस्टम पहले से ज़्यादा मज़बूत, लेकिन क्लाइमेट अभी भी एक चुनौती
हालांकि फ़ूड सिस्टम को ज़्यादा मज़बूत बनाया गया है, लेकिन क्लाइमेट चेंज की वजह से बढ़ती अनिश्चितता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ग्लोबल वार्मिंग मॉनसून के समय और पैटर्न को तेज़ी से अनप्रेडिक्टेबल बना रही है। इससे सूखे और बाढ़ जैसी खराब मौसम की घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है। (गुजराती से गूगल अनुवाद, मूल अहेवाल देंखे)
ગુજરાતી
English