गुजरात: भरूच में सिलिका माफिया का खेल; ₹6,000 करोड़ की चोरी, सिलिकोसिस और खेती बर्बाद

भरूच के भीमपोर-झगड़िया बेल्ट में सिलिका का करोड़ों का अवैध खनन, प्रदूषण और प्रशासनिक मिलीभगत का पर्दाफाश

दिलीप पटेल, अहमदाबाद जून 2026

1. प्रस्तावना और भौगोलिक विस्तार

भरूच जिले के झगड़िया तालुका में पाई जाने वाली सिलिका सैंड (रेत) गुणवत्ता के मामले में पूरे भारत में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। कांच, सीमेंट, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक चिप्स, सोलर पैनल और सिरामिक जैसे कई महत्वपूर्ण उद्योगों के लिए यह सिलिका एक बुनियादी जरूरत है। हालांकि, यह मूल्यवान खनिज अब स्थानीय लोगों और पर्यावरण के लिए एक अभिशाप बन गया है।

भीमपोर-झगड़िया बेल्ट का अनुमानित दायरा:

  • प्रमुख क्षेत्र: भीमपोर, दमलाई, राजपारडी, अवीधा क्षेत्र।

  • भौगोलिक लंबाई-चौड़ाई: उत्तर-दक्षिण लगभग 12 से 18 किमी और पूर्व-पश्चिम लगभग 4 से 8 किमी (1000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र)।

  • Lease का विवरण: पूरे गुजरात में सिलिका सैंड की 50 से अधिक सक्रिय लीज हैं (जिसका 98% भंडार कच्छ में होने के बावजूद भरूच उत्पादन का मुख्य केंद्र है)। यहां 30 से 50 सक्रिय खनन लीज और अनगिनत अवैध खनन गड्ढे हैं।

2. ₹6,000 करोड़ का महा-घोटाला और कानून का उल्लंघन

वर्ष 2016 से भीमपोर पट्टी में बड़े पैमाने पर खनन शुरू हुआ था। वर्ष 2006 से पर्यावरणीय मंजूरी (EC) अनिवार्य होने के बावजूद, यहां बिना किसी मंजूरी के अवैध रूप से खदानें खोदी गई हैं।

  • जमीन का प्रकार: यह भूमि आदिवासियों की सुरक्षा के लिए 73-AA की जमीन है और साथ ही सिंचाई विभाग की सरकारी भूमि है। सिंचाई विभाग की अनुमति के बिना इस सरकारी भूमि पर अवैध खनन धड़ल्ले से चल रहा है।

  • खनिज चोरी का अनुमान: पिछले 10 वर्षों से चल रहे इस काले कारोबार में भीमपोर पट्टी से लगभग ₹6,000 करोड़ के खनिज की चोरी होने का अनुमान है।

  • उत्पादन और मूल्य: भीमपोर की ऐतिहासिक लीज लगभग 178 हेक्टेयर में फैली हुई है। सरकारी दस्तावेजों में वार्षिक उत्पादन क्षमता 2,30,000 टन दिखाई गई है, जिसकी वार्षिक कीमत ₹200 करोड़ होती है। वास्तविकता में, निजी लीज धारक केवल 50-120 हेक्टेयर से ही सालाना 1 लाख टन से अधिक सिलिका चुपके से निकाल लेते हैं।

प्रोसेसिंग में सोना-चांदी की कमाई:

इस सिलिका की प्रोसेसिंग के दौरान सह-उत्पाद (byproduct) के रूप में थोड़ी मात्रा में सोना और चांदी भी निकलता है। बिड़ला सेंचुरी जैसी कंपनियों को कांच के लिए सिलिकॉन प्राप्त करने के लिए इस रेत को गर्म करना पड़ता है। रिपोर्टों के अनुसार, केवल एक कारखाने को सह-उत्पाद के रूप में सालाना 20 किलो सोना मिलता है, जिसका आर्थिक लाभ रसूखदार लोग उठा रहे हैं।

3. जीपीसीबी (GPCB) की कागजी कार्रवाई और भ्रष्टाचार

17 मार्च 2026 तक गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (GPCB) के अधिकारियों ने झगड़िया, नेत्रंग और वालिया में 68 अवैध इकाइयों की पहचान की थी। लेकिन भ्रष्टाचार के कारण कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई:

  • 44 इकाइयों की जांच की, 24 को बचा लिया गया: GPCB ने 68 में से केवल 44 इकाइयों की जांच की और 24 इकाइयों को जांच से बाहर रखकर बचा लिया। माना जाता है कि ये 24 इकाइयां प्रभावशाली राजनेताओं और उच्च अधिकारियों की हैं।

  • मामूली नोटिस: 68 में से केवल 14 इकाइयों को ही पर्यावरण कानूनों के तहत नोटिस दिया गया था।

  • जांच बंद: जांच की गई इकाइयों में से 8 इकाइयों की जांच बीच में ही बंद कर दी गई, जबकि 13 इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई का फैसला अभी भी लटका हुआ है।

  • अधिकारियों की मिलीभगत: मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के अधिकारियों और GPCB के ‘बारड’ नाम के अधिकारी के इस क्षेत्र में गहरे संबंध हैं और उन्हीं के आशीर्वाद से यह खेल चल रहा है। स्थानीय सांसद मनसुख वसावा भी इस मामले पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं, जिससे जनता में भारी आक्रोश है।

4. पर्यावरणीय विनाश: वाशिंग प्लांट और खेती को नुकसान

जब सिलिका को पानी से धोया जाता है, तो इसकी कीमत तीन से चार गुना बढ़ जाती है। इस मुनाफे के लिए पूरी सड़कों पर लगातार वाशिंग प्लांट लगा दिए गए हैं। राजपारडी और झगड़िया मार्गों पर, और विशेष रूप से भीमपोर से जाडेश्वर चौकड़ी तक के केवल 1 किलोमीटर के दायरे में 50 वाशिंग प्लांट चल रहे हैं। राजपारडी में ऐसे लगभग 30 प्लांट हैं, जिनमें से प्रत्येक औसतन 20 हजार टन के हिसाब से सालाना 6 लाख टन रेत धोता है। GMDC ने भी कोयला खनन के लिए खदानों पर सिलिका और मिट्टी के बड़े-बड़े ढेर लगा दिए हैं।

पर्यावरण और कृषि पर प्रभाव:

  • जल स्तर की बर्बादी: प्रत्येक वाशिंग प्लांट में 3-3 बोरवेल बनाकर अवैध रूप से लाखों लीटर भूजल खींचा जा रहा है। इसके कारण स्थानीय एक्विफर (Aquifer – भूजल स्तर) और छोटे तालाब पूरी तरह से सूख गए हैं। इस क्लस्टर की कोई पर्यावरणीय जांच नहीं की जाती है।

  • जहरीला पानी और रसायन: प्लांट के अपशिष्ट जल (वेस्ट वाटर) की जांच में 7.8 pH, 60 mg COD और 12 mg BOD पाया गया है, जो दर्शाता है कि पानी बेहद प्रदूषित है। किसी भी यूनिट में ईटीपी (ETP – एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) नहीं है।

  • खेती बर्बाद: राजपारडी, माधवपुरा, सांकरीया और भीमपोर की 500 एकड़ उपजाऊ भूमि पर वाशिंग प्लांट का केमिकल युक्त पानी फैलने से वहां रेत की मोटी परत जम गई है और खेती पूरी तरह से नष्ट हो गई है। इस संबंध में कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा गया है।

5. जन स्वास्थ्य पर संकट: ‘सिलिकोसिस’ का जानलेवा शिकंजा

इस प्रदूषण के कारण पूरा झगड़िया तालुका बीमारियों की चपेट में है। तालुका के 165 गांवों में से 70 गांव सीधे प्रभावित हो रहे हैं। भीमपोर (राजपारडी) क्षेत्र वर्तमान में ‘दूसरा खंभात या अंबाजी’ बनने की राह पर है।

  • सिलिकोसिस रोग: हवा में उड़ने वाली सिलिका सैंड और पाउडर के बारीक कणों के सांस के जरिए शरीर में जाने से स्थानीय लोग फेफड़ों की लाइलाज और गंभीर बीमारी ‘सिलिकोसिस’ (Silicosis) और कैंसर का शिकार हो रहे हैं।

  • लक्षण: सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई, लगातार खांसी और फेफड़ों का हमेशा के लिए कमजोर हो जाना। यह एक जानलेवा बीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं है।

6. आर्थिक विश्लेषण: बाजार मूल्य बनाम सरकारी रॉयल्टी

सिलिका उद्योग में करोड़ों की कमाई है लेकिन सरकार के खजाने को केवल मामूली रकम ही मिलती है। पूरे गुजरात की खदानों से सरकार को सालाना केवल ₹50 करोड़ जैसी मामूली रॉयल्टी मिलती है, जबकि उद्योगपति अरबों रुपये कमा रहे हैं।

सिलिका का बाजार मूल्य (प्रति टन):

सिलिका का प्रकार बाजार मूल्य (प्रति टन)
कच्ची सिलिका रेत ₹500 – ₹1,500
भीमपोर-दमलाई बेल्ट (कच्ची रेत) ₹600 – ₹1,500
वॉश्ड (धोई हुई) सिलिका रेत ₹1,500 – ₹4,000
फाउंड्री ग्रेड सिलिका ₹2,500 – ₹6,000
ग्लास Grade सिलिका ₹3,000 – ₹8,000
सिलिका फ्लोर ₹4,000 – ₹15,000
हाई प्यूरिटी सिलिका ₹8,000 – ₹20,000+
भीमपोर की स्पेशल सिलिका ₹10,000 (प्रति टन)

नोट: भरूच बेल्ट से सालाना 10 लाख टन सिलिका निकलती है। यदि हम सामान्य सिलिका की कीमत ₹2,000 भी मान लें, तो यह ₹200 से ₹500 करोड़ का सीधा व्यापार है, लेकिन भीमपोर की उच्च गुणवत्ता वाली सिलिका ₹10,000 प्रति टन तक बिकती है, जो इस आंकड़े को बहुत बड़ा बना देती है।

विभिन्न क्षेत्रों का दबदबा और उत्पादन अनुमान:

  1. GMDC राजपारडी ब्लॉक (150-250 हेक्टेयर): यह GMDC के अधीन है, जहां हर साल 2 से 4 लाख टन सिलिका का खनन किया जाता है।

  2. दमलाई क्षेत्र (80-150 हेक्टेयर): रिंकू ग्रुप (Rinku Group) द्वारा यहां सालाना 1 से 2 lakh टन सिलिका निकाली जाती है।

  3. गोवाली प्रोसेसिंग जोन (20-40 हेक्टेयर): SMDC के इस जोन से सालाना 1 लाख टन माल निकाला जाता है।

  4. अन्य केंद्र: सुल्तानपुरा (सिलिका खदान क्षेत्र), समणी (निजी खदान और प्रोसेसिंग), और दहेज-वागरा (प्रोसेसिंग और सिलिका उद्योग)।

7. वर्तमान परियोजनाएं और प्रशासन की निष्क्रियता

इस गंभीर स्थिति के बीच भी, जनवरी 2025 में भीमपोर में ₹165 करोड़ की लागत से 18,000 TPA (टन प्रति वर्ष) की क्षमता वाला एक नया आधुनिक सिलिका वाशिंग, स्क्रीनिंग और ड्राइंग यूनिट स्थापित करने का काम शुरू किया गया था, जो मार्च 2025 में पूरा हो चुका है। इसकी पर्यावरणीय मंजूरी का प्रस्ताव स्टेट लेवल एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) को सौंप दिया गया है।

दूसरी ओर, डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (DMF) की निगरानी समिति खनिज प्रभावित क्षेत्रों के विकास या लोगों के स्वास्थ्य के लिए कोई ठोस काम नहीं कर रही है। तत्कालीन कलेक्टर गौरांग मकवाना ने प्रदूषण नियंत्रण के 6 कार्यों के लिए ₹2 करोड़ 20 लाख आवंटित किए थे, लेकिन ये काम भी अभी तक अधूरे पड़े हैं।

8. निष्कर्ष

भरूच का भीमपोर-झगड़िया सिलिका बेल्ट प्रशासनिक लापरवाही, राजनीतिक संरक्षण और पर्यावरणीय अपराध का एक जीता-जागता उदाहरण बन गया है। यदि अवैध वाशिंग प्लांटों को जल्द बंद नहीं किया गया, भूजल की चोरी नहीं रोकी गई और ईटीपी (ETP) प्लांट अनिवार्य नहीं किए गए, तो यह क्षेत्र जल्द ही मानव निवास के अयोग्य हो जाएगा और हजारों लोग सिलिकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी के कारण मौत के मुंह में चले जाएंगे।