गिर में फिर वायरस का खतरा: 13 शेरों की मौत

गिर में फिर वायरस का खतरा: 13 शेरों की मौत, जसाधार क्वारंटीन और पारदर्शिता पर उठते सवाल

दिलीप पटेल

अहमदाबाद, 11 जून 2026

गिर के एशियाई शेरों में एक बार फिर संक्रामक बीमारी के खतरे ने वन विभाग को सतर्क कर दिया है। पिछले कुछ दिनों में 13 शेरों की मौत की खबरों के बाद वन विभाग ने जसाधार एनिमल केयर सेंटर, जामवाला रेस्क्यू सेंटर और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में हाई अलर्ट घोषित किया है। वहीं वन्यजीव कार्यकर्ता और विशेषज्ञ सरकार की कार्रवाई, सूचना साझा करने की प्रक्रिया और शेरों को बंदी बनाकर रखने के कानूनी आधार पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने हाल ही में प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने जामवाला रेस्क्यू सेंटर, बाबरिया क्षेत्र और जसाधार एनिमल केयर सेंटर में आइसोलेशन में रखे गए शेरों की चिकित्सा व्यवस्था, दवाओं की उपलब्धता और संक्रमण को रोकने के लिए की गई तैयारियों का निरीक्षण किया।

मंत्री ने कहा कि सरकार किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं लेना चाहती। इसके लिए उच्चस्तरीय बैठक आयोजित कर शेरों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, गहन निगरानी और संक्रमण के स्रोत की पहचान पर चर्चा की गई।

हालांकि दूसरी ओर कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। वन्यजीव कार्यकर्ताओं का दावा है कि जसाधार में लगभग 15 शेरों को बंदी बनाकर रखा गया है, लेकिन उन्हें किस कानूनी आधार पर रखा गया है, इसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत ऐसे मामलों में मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (Chief Wildlife Warden) की अनुमति और वैज्ञानिक आधार आवश्यक माने जाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी जंगली शेर को उसकी प्राकृतिक टेरिटरी से हटाने का उसके व्यवहार और सामाजिक संरचना पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। उसकी अनुपस्थिति में दूसरे शेर उस क्षेत्र पर कब्जा कर सकते हैं। बाद में उसे वापस छोड़ने पर संघर्ष की स्थिति बन सकती है और शावकों के लिए भी खतरा उत्पन्न हो सकता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि मई में लिए गए नमूनों की जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि संक्रमण का कारण ज्ञात हो चुका है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।

गिर में बीमारी का संकट नया नहीं है। वर्ष 2018 में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) के प्रकोप ने एशियाई शेरों को गंभीर रूप से प्रभावित किया था। जांच में 23 में से 21 शेर संक्रमित पाए गए थे। इसके बाद दो वर्षों में 60 से अधिक शेरों की मौत हुई थी। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार ने अमेरिका से विशेष वैक्सीन मंगवाकर शेरों और अन्य संवेदनशील वन्यजीवों का टीकाकरण कराया था।

वर्ष 2021 में भी एक क्षेत्र में 12 शेरों की मौत ने चिंता बढ़ा दी थी। वर्तमान घटनाक्रम ने 2018 के संकट की याद फिर ताजा कर दी है।

वन विभाग के अनुसार 2015 में गुजरात में 523 शेर थे, जो 2020 में बढ़कर 674 हो गए। वर्ष 2025 की गणना में इनकी संख्या बढ़कर 891 दर्ज की गई है। यह आबादी 11 जिलों के 58 तालुकाओं में फैली हुई है।

विशेषज्ञों के अनुसार शेरों की बढ़ती संख्या के साथ नए खतरे भी सामने आए हैं। शेरों के आवास क्षेत्रों में लगभग 1.08 लाख आवारा कुत्ते मौजूद हैं, जिन्हें CDV जैसे वायरस के संभावित वाहक माना जाता है। 2018 के बाद प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययनों में भी आवारा कुत्तों को वन्यजीवों में वायरस फैलने के जोखिम से जोड़ा गया था।

इसके अलावा इन क्षेत्रों में लगभग 80 हजार से अधिक आवारा मवेशी भी हैं। इन पशुओं में पाई जाने वाली टिक (इतरड़ी) के माध्यम से बेबेसिया जैसे परजीवी रोग फैल सकते हैं, जो शेरों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर सकते हैं।

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता का है। जसाधार सहित कुछ क्षेत्रों में पत्रकारों और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों के प्रवेश पर प्रतिबंध होने के कारण अधिकांश जानकारी केवल वन विभाग के माध्यम से ही उपलब्ध हो रही है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि संक्रमण, उपचार और मौतों के कारणों से संबंधित नियमित बुलेटिन जारी किए जाने चाहिए।

इस बीच गिर के आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों में खनन और औद्योगिक गतिविधियों को लेकर भी चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। राजुला तालुका के बाबरकोट क्षेत्र की वन भूमि को खनन के लिए आवंटित करने के प्रस्तावों का कई संगठनों ने विरोध किया है।

फिलहाल वन विभाग संक्रमण को रोकने के लिए निगरानी, नमूना परीक्षण और उपचार की प्रक्रिया में जुटा हुआ है। लेकिन 2018 के संकट के बाद एक बार फिर उठे इस खतरे ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि बढ़ती शेर आबादी के साथ उनके स्वास्थ्य, आवास और रोग नियंत्रण के लिए दीर्घकालिक तैयारी कितनी मजबूत है।

गिर के शेर केवल गुजरात ही नहीं, बल्कि विश्व की प्राकृतिक धरोहर हैं। इसलिए वर्तमान स्थिति में पारदर्शिता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सार्वजनिक विश्वास बनाए रखना सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।