भारत में डेटा और चिप उद्योगों का विरोध; गुजरात खामोश

राष्ट्रीय स्तर पर निवेश में गिरावट के बावजूद, गुजरात ने 3 चिप फैक्ट्रियों और डेटा सेंटरों को मंजूरी दी

अहमदाबाद
जून के बाद से, भारत के डेटा सेंटर सेक्टर में विदेशी निवेश में कमी आई है। इसका मुख्य कारण स्थानीय समुदायों का विरोध है, जिन्हें पानी और बिजली की भारी खपत को लेकर चिंता है। नतीजतन, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कई परियोजनाएं अटक गई हैं। इसके विपरीत, गुजरात में ऐसी परियोजनाओं के लिए कोई विरोध नहीं है, जिससे वहां इनके लिए राह आसान हो गई है।

ऐसी ही एक परियोजना गुजरात के जामनगर में आ रही है, जिसमें बहुत बड़ी मात्रा में पानी की खपत होगी। डेटा ऑपरेशंस के लिए जरूरी चिप्स बनाने के लिए तीन फैक्ट्रियां लगाई जा रही हैं। इन तीनों इकाइयों को इतना पानी चाहिए होगा, जितना अहमदाबाद और सूरत की पूरी आबादी मिलकर रोजाना इस्तेमाल करती है। इसके अलावा, अहमदाबाद के पास एक और चिप निर्माण संयंत्र लगाने की योजना है।

साथ ही, बिजली की भारी मांग को पूरा करने के लिए बिजली की लाइनें बिछाई जा रही हैं, जिसका स्थानीय किसान विरोध कर रहे हैं।

हालांकि, इस क्षेत्र में काम करने वाले गुजरात के स्वयंसेवी संगठन (NGOs) पूरी तरह से निष्क्रिय नजर आ रहे हैं। इसके अलावा, स्थानीय लोगों को इस बात का अंदाजा भी नहीं है कि इसमें कितना पानी खर्च होगा। गुजरात राज्य सरकार और केंद्र सरकार, दोनों ने इन उद्योगों को अरबों रुपये की सब्सिडी दी है। उदाहरण के लिए, धोलेरा में टाटा सबसे आगे है, जिसे 44,000 करोड़ रुपये मिले हैं; बदले में, कंपनी ने भाजपा को फंड दिया है। अटकी हुई निवेश परियोजनाएं
जून 2026 के बाद से, भारत के डेटा सेंटर सेक्टर में आने वाले विदेशी निवेश में काफी गिरावट आई है। जिस सेक्टर में पहले तेजी से सौदे हो रहे थे, वहां अब एक बड़ा बदलाव आया है। निवेश की गति धीमी हो गई है, और साल की पहली छमाही की तुलना में औसत मासिक फंडिंग काफी कम हो गई है। यह गिरावट सिर्फ बाजार के उतार-चढ़ाव का नतीजा नहीं है; बल्कि इसके पीछे जमीनी स्तर पर बढ़ता वह विरोध भी है, जो इन इकाइयों की स्थापना और उनके संचालन को लेकर हो रहा है।

स्थानीय विरोध और नियामक देरी
इस गिरावट का एक मुख्य कारण स्थानीय स्तर पर होने वाला विरोध है। आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जैसे क्षेत्रों में, सामुदायिक समूहों ने बड़े पैमाने की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं—जिनमें गूगल से जुड़ी एक बड़ी विकास परियोजना भी शामिल है—को लेकर चिंताएं जताई हैं। ये चिंताएं मुख्य रूप से कंबलाकोंडा अभयारण्य के पास संभावित पर्यावरणीय प्रभावों, और इन सुविधाओं के कारण स्थानीय जल तथा बिजली संसाधनों पर पड़ने वाले भारी दबाव से जुड़ी हैं। एक जनहित याचिका (PIL) दायर किए जाने के बाद, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय इन मुद्दों की समीक्षा कर रहा है, जिससे डेवलपर्स के लिए अनिश्चितता बढ़ गई है।

महाराष्ट्र के ठाणे में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिल रही है, जहां स्थानीय निवासियों ने ध्वनि प्रदूषण और स्थानीय पावर ग्रिड पर पड़ने वाले दबाव को लेकर चिंता जताई है। इन विरोध प्रदर्शनों के कारण कंपनियों को अपनी साइट चुनने के फैसले पर पुनर्विचार करने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। नियामक संस्थाएं अब पर्यावरणीय मंजूरियों की बारीकी से जांच कर रही हैं, जिससे परियोजनाओं को शुरू करने में लगने वाला समय और लागत, दोनों बढ़ रहे हैं। डेवलपर्स के लिए, इन स्थानीय चिंताओं को दूर करना अब कोई मामूली काम नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ी परिचालन चुनौती बन गया है।

वित्तीय प्रभाव और निवेशकों की रणनीति
डेटा सेंटर क्षेत्र एक पूंजी-प्रधान व्यवसाय है, जिसमें विस्तार के लिए लगातार निवेश की आवश्यकता होती है। जब नियामक या सामाजिक बाधाओं के कारण परियोजनाओं में देरी होती है, तो लागत बढ़ सकती है, जिससे वित्तीय रिटर्न पर दबाव पड़ता है।

भारत के डेटा बुनियादी ढांचे का दीर्घकालिक भविष्य, देश की बढ़ती AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) महत्वाकांक्षाओं से गहराई से जुड़ा है। योटा डेटा सर्विसेज (Yotta Data Services) जैसी कंपनियां 8,000 करोड़ रुपये तक की पूंजी जुटाने की तैयारी में हैं। कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने के लिए, सरकार ने कुछ विधायी बदलाव किए हैं—जैसे ‘कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026’—जिसका उद्देश्य विदेशी कंपनियों के लिए अनुपालन (compliance) संबंधी कठिनाइयों को कम करना है। निवेशकों को परियोजनाओं के शुरू होने की समय-सीमा, प्रमुख राज्यों में चल रहे कानूनी मामलों की स्थिति, और कंपनियां अपने जल तथा बिजली की खपत की रिपोर्ट कैसे देती हैं, इन बातों पर नज़र रखनी चाहिए। (गुजराती से गूगल अनुवाद)