2008 में फोन रिकॉर्ड, 2026 में AI निगरानी: गुजरात में बढ़ती इंटेलिजेंस

‘ऑपरेशन म्यूल हंट’ से AI आधारित निगरानी तक, गुजरात में डिजिटल मॉनिटरिंग का नया युग

दिलीप पटेल
अहमदाबाद

गुजरात पुलिस और साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस द्वारा चलाए गए “ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0” के तहत ₹2,289 करोड़ के साइबर फ्रॉड नेटवर्क का पर्दाफाश किया गया है। 913 म्यूल अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई, 565 FIR और 638 गिरफ्तारियों के साथ यह अभियान राज्य के अब तक के सबसे बड़े साइबर-फाइनेंशियल क्रैकडाउन में से एक माना जा रहा है।

लेकिन इस घटना ने केवल साइबर अपराधों के मुद्दे को ही नहीं, बल्कि गुजरात में पिछले दो दशकों से बढ़ती खुफिया निगरानी, डिजिटल सर्विलांस और डेटा मॉनिटरिंग व्यवस्था पर भी नई बहस छेड़ दी है।

2008 में उठा था सवाल

गुजरात में खुफिया और निगरानी तंत्र पर बढ़ते खर्च का मुद्दा नया नहीं है।

2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में इंटेलिजेंस नेटवर्क के विस्तार के लिए अतिरिक्त बजटीय प्रावधान किए गए थे। उस समय राजनीतिक हलकों में आरोप लगाए गए थे कि निगरानी तंत्र का उपयोग केवल सुरक्षा उद्देश्यों के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक विरोधियों, भाजपा के अंदरूनी प्रतिद्वंद्वियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कुछ उद्योगपतियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भी किया जा रहा था।

पूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता ने आरोप लगाया था कि उनकी दैनिक गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जाती थी। वहीं पूर्व विधायक धीरू गजेरा ने दावा किया था कि राज्यभर के राजनेताओं के फोन रिकॉर्ड का विश्लेषण किया जाता था।

इन आरोपों की कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन बढ़ते खुफिया खर्च ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया था।

₹10 करोड़ से ₹1,500 करोड़ तक

गुजरात में इंटेलिजेंस और तकनीकी निगरानी पर खर्च पिछले दो दशकों में कई गुना बढ़ा है।

उपलब्ध बजट दस्तावेजों के अनुसार 2001-02 में खुफिया गतिविधियों पर खर्च लगभग ₹10 करोड़ था।

2007-08 में पुलिस बजट लगभग ₹1,900 करोड़ था। इसमें आधुनिकीकरण और तकनीकी निगरानी के लिए विशेष प्रावधान किए गए थे।

2013-14 तक पुलिस बजट बढ़कर लगभग ₹3,800 करोड़ हो गया। उस समय पुलिस आधुनिकीकरण, संचार प्रणाली और खुफिया तंत्र को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

2026-27 के बजट में पुलिस और सुरक्षा ढांचे के लिए लगभग ₹9,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसमें AI आधारित पुलिसिंग, डेटा फ्यूजन सेंटर, साइबर सुरक्षा, एनालिटिक्स और एंटी-ड्रोन सिस्टम जैसी परियोजनाओं के लिए बड़ी राशि निर्धारित की गई है।

सरकार का कहना है कि इन निवेशों का उद्देश्य आतंकवाद, संगठित अपराध, साइबर अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों का मुकाबला करना है।

क्या है ऑपरेशन म्यूल हंट?

साइबर अपराधों में म्यूल अकाउंट सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।

म्यूल अकाउंट वह बैंक खाता होता है जिसका उपयोग साइबर अपराधी धोखाधड़ी से प्राप्त धनराशि को इधर-उधर स्थानांतरित करने के लिए करते हैं।

अक्सर ऐसे खाते आम नागरिकों के नाम पर खोले जाते हैं। कुछ लोग कमीशन के लालच में अपने बैंक खाते उपलब्ध करा देते हैं।

गुजरात पुलिस ने 2025 में “ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0” शुरू कर ऐसे नेटवर्क को निशाना बनाया।

4,052 साइबर अपराधों से जुड़ा नेटवर्क

जांच के दौरान पुलिस, साइबर सेल, I4C, नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल, 1930 हेल्पलाइन और विभिन्न बैंकों के डेटा का विश्लेषण किया गया।

जांच में देशभर के 4,052 साइबर अपराधों से जुड़े वित्तीय नेटवर्क की पहचान हुई। इनमें से 491 मामले सीधे गुजरात से जुड़े पाए गए।

कार्रवाई के परिणाम:

  • 913 म्यूल अकाउंट्स पर कार्रवाई
  • 565 FIR दर्ज
  • 638 आरोपी गिरफ्तार
  • ₹2,289 करोड़ के संदिग्ध वित्तीय लेनदेन की पहचान

यह दर्शाता है कि साइबर फ्रॉड अब केवल ऑनलाइन ठगी नहीं बल्कि एक समानांतर वित्तीय अपराध तंत्र बन चुका है।

चेक और ATM निकासी में गिरावट

सरकारी आंकड़ों के अनुसार कार्रवाई के बाद संदिग्ध वित्तीय लेनदेन में उल्लेखनीय कमी आई है।

  • चेक आधारित निकासी ₹126 करोड़ प्रति माह से घटकर लगभग ₹25 करोड़ रह गई।
  • ATM के माध्यम से संदिग्ध निकासी में लगभग 66 प्रतिशत कमी आई।
  • प्रथम स्तर के म्यूल अकाउंट्स की संख्या में भी कमी दर्ज की गई।

साइबर अपराध की नई तकनीकें

साइबर अपराधी अब अत्याधुनिक तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं:

  • डिजिटल अरेस्ट
  • फर्जी KYC अपडेट
  • OTP शेयरिंग
  • QR कोड स्कैम
  • निवेश धोखाधड़ी
  • लोन ऐप फ्रॉड
  • फर्जी नौकरी ऑफर
  • सोशल मीडिया स्कैम

अपराधी पहले म्यूल अकाउंट में धन जमा करवाते हैं और फिर कई स्तरों में ट्रांसफर करके ट्रेल छिपा देते हैं।

अब AI करेगा निगरानी

2008 में निगरानी मुख्य रूप से मानव स्रोतों, CDR, मोबाइल लोकेशन और पारंपरिक सर्विलांस पर आधारित थी।

लेकिन 2026 तक स्थिति बदल चुकी है।

अब राज्य में:

  • AI आधारित पुलिसिंग
  • डेटा फ्यूजन सेंटर
  • AI इन पुलिसिंग सेंटर ऑफ एक्सीलेंस
  • एंटी-ड्रोन सिस्टम
  • साइबर एनालिटिक्स

जैसी परियोजनाएं लागू की जा रही हैं।

AI आधारित सिस्टम करोड़ों डिजिटल लेनदेन का विश्लेषण कर संदिग्ध पैटर्न पहचान सकते हैं।

सुरक्षा या निगरानी?

विशेषज्ञ मानते हैं कि साइबर सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक आवश्यक है।

लेकिन सवाल यह भी है कि सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

2008 में जो बहस फोन सर्विलांस को लेकर थी, वही अब AI, डेटा फ्यूजन और डिजिटल मॉनिटरिंग तक पहुंच चुकी है।

सरकार का कहना है कि इन तकनीकों का उपयोग केवल अपराध नियंत्रण के लिए किया जाता है, जबकि नागरिक अधिकारों के पक्षधर पारदर्शिता, जवाबदेही और निजता की सुरक्षा पर जोर देते हैं।

डिजिटल युग की नई चुनौती

₹2,289 करोड़ के साइबर फ्रॉड का खुलासा केवल एक पुलिस अभियान की सफलता नहीं है।

यह दर्शाता है कि अपराध अब डिजिटल माध्यमों में स्थानांतरित हो चुका है और उससे निपटने के लिए सरकारें भी AI, डेटा एनालिटिक्स और रियल-टाइम मॉनिटरिंग का सहारा ले रही हैं।

गुजरात में पिछले दो दशकों में इंटेलिजेंस और डिजिटल मॉनिटरिंग पर खर्च कई गुना बढ़ा है। अब बड़ा प्रश्न यह है कि बढ़ती तकनीक और बढ़ती निगरानी के बीच सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता का संतुलन कैसे कायम रखा जाएगा।