हजीरा की हकीकत: मोदी हजीरा गए, समुद्र, मैंग्रोव और प्रदूषण विनाश पर चर्चा नहीं हुई

पर्यावरण का विनाश: जहां मोदी ने विश्व पर्यावरण दिवस मनाया, वहीं प्रदूषण और मैंग्रोव विनाश के सवाल

20 किलोमीटर में मैंग्रोव का विनाश, आधा किलोमीटर अंदर जाते तो क्या देखते?

दिलीप पटेल
हजीरा/सूरत

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 जून 2026 को सूरत के हजीरा क्षेत्र पहुंचे थे। ग्रीन एनर्जी, ग्रीन स्टील और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ आयोजित कार्यक्रम में गुजरात को हरित विकास के मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन जिस स्थान से यह संदेश दिया गया, वही हजीरा क्षेत्र कई वर्षों से प्रदूषण, मैंग्रोव विनाश, भूमि विवाद और मछुआरों की आजीविका से जुड़े प्रश्नों के कारण चर्चा में रहा है।

स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि कार्यक्रम स्थल से केवल आधा किलोमीटर अंदर जाकर वास्तविक स्थिति देखी जाती, तो हजीरा के औद्योगिक विकास का दूसरा चेहरा भी सामने आता।

हजीरा आज देश के सबसे बड़े औद्योगिक केंद्रों में से एक है। यहां रिलायंस, एएम/एनएस स्टील, ओएनजीसी, एनटीपीसी और एल एंड टी जैसी बड़ी कंपनियां कार्यरत हैं। विभिन्न अनुमानों के अनुसार इस क्षेत्र में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का औद्योगिक निवेश हुआ है।

लेकिन विकास के साथ-साथ वायु, जल और भूमि प्रदूषण के मुद्दे लगातार उठते रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों ने बार-बार शिकायत की है कि रात के समय रासायनिक गंध, धुंध, धूल और सांस लेने में कठिनाई जैसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं। कुछ निगरानी रिपोर्टों में PM2.5 और PM10 का स्तर स्वीकार्य सीमा से अधिक पाया गया है।

सुवाली, दमका, मोरा और आसपास के गांवों के निवासी वर्षों से दुर्गंध, फ्लाई ऐश और औद्योगिक धूल की शिकायत करते रहे हैं।

पर्यावरणविदों और स्थानीय संगठनों का दावा है कि औद्योगिक अपशिष्ट और गंदे पानी के कारण तापी नदी के मुहाने और तटीय क्षेत्रों की जल गुणवत्ता प्रभावित हुई है। 2025 में दमका गांव के निकट बड़ी संख्या में मछलियों की मृत्यु के बाद स्थानीय लोगों ने औद्योगिक अपशिष्ट छोड़े जाने के आरोप लगाए थे।

हजीरा क्षेत्र की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चिंताओं में मैंग्रोव का विनाश भी शामिल है। उपलब्ध उपग्रह अध्ययनों के अनुसार पिछले तीन दशकों में हजीरा प्रायद्वीप और आसपास के क्षेत्रों में लगभग 1,500 से 2,000 हेक्टेयर मैंग्रोव और उससे जुड़े मडफ्लैट्स नष्ट या गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं।

2016 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने हजीरा पोर्ट से जुड़े एक मामले में पर्यावरणीय क्षति के लिए 25 करोड़ रुपये के मुआवजे का आदेश दिया था। इस मामले में मैंग्रोव संरक्षण, तटीय निर्माण और मछुआरों की शिकायतें प्रमुख मुद्दे थे।

विधानसभा में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार हजीरा क्षेत्र में कुछ कंपनियों के खिलाफ सरकारी भूमि पर अतिक्रमण के मामलों में कार्रवाई चल रही है। लगभग 62.56 हेक्टेयर भूमि से जुड़े मामलों में 106.82 करोड़ रुपये से अधिक के दंड की प्रक्रिया घोषित की गई थी।

स्थानीय किसानों और ग्रामीणों का कहना है कि गौचर भूमि और कृषि भूमि औद्योगिक उपयोग में जाने से पशुपालन और खेती प्रभावित हुई है। कई लोगों का यह भी आरोप है कि उन्हें बाजार मूल्य के अनुरूप मुआवजा नहीं मिला।

स्थानीय सामाजिक संगठनों के अनुसार हजीरा और आसपास के क्षेत्रों में सीवेज प्रबंधन और अपशिष्ट उपचार की सुविधाएं अभी भी अपर्याप्त हैं। श्वसन और त्वचा संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायतें भी सामने आती रही हैं, हालांकि सभी मामलों में वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

हकीकत यह है कि हजीरा गुजरात की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण इंजन है। यहां से स्टील, पेट्रोकेमिकल और ऊर्जा उत्पादों का निर्यात होता है। हजारों लोगों को रोजगार मिलता है और राज्य को बड़ा राजस्व प्राप्त होता है।

लेकिन दूसरी ओर पर्यावरण, मैंग्रोव, मछुआरों, किसानों और स्थानीय समुदायों के प्रश्न भी लगातार उठ रहे हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस पर हरित विकास की बात हुई, लेकिन हजीरा के गांवों में आज भी लोग पूछ रहे हैं कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन आखिर कहां है?