गुजरात: पाटन में सेक्स्ड सीमेन तकनीक, ‘गुलाबी क्रांति’ के बाद अब ‘लैब क्रांति’, 91% मादा बछड़ों का जन्म

गौवंश में बैलों की घटती आबादी: ‘गुलाबी क्रांति’ के बाद अब ‘लैब क्रांति’ पर बहस

सेक्स्ड सीमेन तकनीक से बढ़ रहे मादा बछड़ों के जन्म, नर गौवंश का भविष्य चर्चा में

दिलीप पटेल
अहमदाबाद

गुजरात में गौरक्षा और गौवंश संरक्षण लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का विषय रहे हैं। लेकिन राज्य के पशुधन आंकड़ों, डेयरी उद्योग की जरूरतों और नई प्रजनन तकनीकों पर नजर डालें तो एक अलग तस्वीर सामने आती है। सवाल उठ रहा है कि क्या आने वाले दशकों में गौवंश में नर पशुओं यानी बैलों और बछड़ों की संख्या बहुत कम हो जाएगी?

गुजरात में वर्ष 2021 से सेक्स्ड सीमेन तकनीक का उपयोग शुरू हुआ है। इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य अधिक मादा बछड़ों का जन्म सुनिश्चित करना है, ताकि दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जा सके। पाटन स्थित गुजरात बोवाइन सीमेन सेक्सिंग संस्थान में जून 2021 से इसका उत्पादन शुरू हुआ था।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2026 तक लगभग 8 लाख सेक्स्ड सीमेन डोज तैयार किए गए। इनमें से 3.41 लाख डोज का उपयोग किया गया, जिसके परिणामस्वरूप 64,500 गर्भधारण हुए और 37,469 बछड़ों का जन्म हुआ। इनमें 34,184 मादा और केवल 3,285 नर बछड़े थे। यानी मादा जन्म का अनुपात 91.23 प्रतिशत दर्ज किया गया।

नर पशु क्यों घट रहे हैं?

सामान्य जैविक परिस्थितियों में नर और मादा जन्म का अनुपात लगभग 50:50 होता है। लेकिन सेक्स्ड सीमेन तकनीक में ऐसे शुक्राणुओं का चयन किया जाता है जो मुख्य रूप से मादा संतान उत्पन्न करते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से नर के वीर्य में X और Y दो प्रकार के गुणसूत्र होते हैं। X गुणसूत्र मादा संतान और Y गुणसूत्र नर संतान के जन्म का कारण बनता है। इस तकनीक में X गुणसूत्र वाले शुक्राणुओं को प्राथमिकता दी जाती है।

डेयरी उद्योग में मादा पशुओं का आर्थिक महत्व अधिक होने के कारण पशुपालक भी बछिया या पाड़ी को प्राथमिकता देते हैं। नर बछड़े दूध उत्पादन में उपयोगी नहीं होते, इसलिए उनकी मांग लगातार घट रही है।

पशुधन के आंकड़े क्या कहते हैं?

2019 की पशुधन गणना के अनुसार गुजरात में लगभग 62 लाख देशी गायें और 18 लाख देशी बैल थे। वहीं विदेशी और क्रॉसब्रीड गायों की संख्या लगभग 33 लाख तथा उनके नर पशुओं की संख्या लगभग 1.36 लाख थी।

इस प्रकार राज्य में कुल गायों की संख्या लगभग 95 लाख थी, जबकि कुल बैलों की संख्या केवल 19.4 लाख के आसपास थी।

विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक परिस्थितियों में नर और मादा पशुओं की संख्या लगभग समान होनी चाहिए। लेकिन खेती के यंत्रीकरण, ट्रैक्टरों के बढ़ते उपयोग, डेयरी आधारित अर्थव्यवस्था और नई प्रजनन तकनीकों के कारण नर पशुओं का अनुपात लगातार घट रहा है।

देशी गौवंश में नर पशुओं की संख्या में लगभग 38.84 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

देशी गायें घटीं, क्रॉसब्रीड बढ़ीं

गुजरात में देशी गायों की संख्या में भी उल्लेखनीय गिरावट आई है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देशी गायों की संख्या में 22.72 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। दूसरी ओर क्रॉसब्रीड और विदेशी नस्ल की गायों की संख्या में 76.84 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

श्वेत क्रांति के बाद अधिक दुग्ध उत्पादन देने वाली नस्लों को प्राथमिकता मिलने लगी। इसके परिणामस्वरूप गिर और कांकरेज जैसी पारंपरिक देशी नस्लों के भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।

2030 के बाद क्या हो सकता है?

यदि वर्तमान रुझान जारी रहता है तो 2030 और उसके बाद की पशुधन गणनाओं में नर पशुओं का अनुपात और कम हो सकता है।

हालांकि यह कहना कि “2030 तक बैल पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे”, उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के आधार पर उचित नहीं होगा। प्राकृतिक प्रजनन, सामान्य सीमेन, संरक्षण कार्यक्रम और देशी नस्लों के संवर्धन की योजनाएं अभी भी जारी हैं।

फिर भी यह स्पष्ट है कि नर पशुओं की आर्थिक उपयोगिता घटने से उनकी आबादी पर दबाव बढ़ रहा है।

देशी नस्लों के लिए चुनौती

गिर और कांकरेज जैसी नस्लें गुजरात की पहचान मानी जाती हैं।

पशुपालन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देशी नस्लों के संरक्षण और संवर्धन को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो भविष्य में उनकी आनुवंशिक विविधता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

देशी नस्लें अधिक गर्मी सहन करने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल रहने की क्षमता रखती हैं, जबकि कई विदेशी नस्लों की देखभाल अधिक महंगी होती है।

सरकार और डेयरी क्षेत्र का पक्ष

सरकार का कहना है कि सेक्स्ड सीमेन तकनीक का उद्देश्य पशुपालकों की आय बढ़ाना है।

एक डोज तैयार करने की लागत लगभग ₹710 बताई जाती है। शुरुआत में किसानों से ₹300 लिए जाते थे, जिसे घटाकर ₹50 कर दिया गया।

डेयरी क्षेत्र का तर्क है कि अधिक मादा पशु का मतलब अधिक दूध उत्पादन और अधिक आय है।

बहस का असली सवाल

यह बहस केवल गौवंश की संख्या की नहीं, बल्कि उसके भविष्य के स्वरूप की है।

एक तरफ डेयरी अर्थव्यवस्था, बढ़ता दूध उत्पादन और आधुनिक तकनीक है। दूसरी तरफ देशी नस्लों का संरक्षण, आनुवंशिक विविधता और नर पशुओं की घटती संख्या को लेकर चिंताएं हैं।

गुजरात में गौरक्षा पर राजनीति लंबे समय से होती रही है, लेकिन अब नई बहस यह है कि बदलती तकनीक और डेयरी अर्थव्यवस्था के बीच गौवंश का भविष्य किस दिशा में जाएगा।