15 कर्मचारियों वाला क्लाइमेट चेंज विभाग; मोदी ने लिया श्रेय, लेकिन जलवायु चुनौतियां बनीं बरकरार
गुजरात में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए योजनाएं बनीं, लेकिन उत्सर्जन, गर्मी, बाढ़ और सूखे की चुनौतियां लगातार बढ़ीं
अहमदाबाद, 11 जून 2026 | दिलीप पटेल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कहा कि दुनिया हरित भविष्य की ओर बढ़ रही है और गुजरात ने वर्षों पहले देश का पहला क्लाइमेट चेंज विभाग स्थापित कर इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई थी। उन्होंने चारणका सोलर पार्क, नवीकरणीय ऊर्जा और हरित विकास मॉडल का उल्लेख करते हुए गुजरात को जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में अग्रणी राज्य बताया।
हालांकि, दूसरी ओर उपलब्ध सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। गर्मी की लहरें, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, समुद्री तटों पर कटाव और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन के बीच राज्य के क्लाइमेट चेंज विभाग की क्षमता और प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
गुजरात सरकार ने वर्ष 2026-27 के बजट में पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन संबंधी कार्यक्रमों के लिए लगभग 429 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। यह राशि पिछले बजट की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत कम है। राज्य का कुल बजट लगभग 4 लाख करोड़ रुपये होने के बावजूद जलवायु क्षेत्र पर खर्च अपेक्षाकृत सीमित माना जा रहा है।
सिर्फ 15 कर्मचारियों वाला विभाग
गुजरात का क्लाइमेट चेंज विभाग वर्ष 2009-10 में स्थापित किया गया था। इसे भारत का पहला और एशिया के शुरुआती राज्य स्तरीय जलवायु परिवर्तन विभागों में गिना जाता है।
विभाग में वर्तमान में लगभग 15 कर्मचारी कार्यरत हैं और वेतन पर सालाना करीब 2 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। तुलना करें तो गृह विभाग में लाखों कर्मचारी कार्यरत हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन जैसी व्यापक चुनौती से निपटने के लिए विभागीय संसाधनों और मानवबल में बड़े विस्तार की आवश्यकता है।
बजट का बड़ा हिस्सा सरकारी इमारतों पर
वर्ष 2026-27 के बजट में सरकारी भवनों पर सोलर रूफटॉप सिस्टम लगाने के लिए 278 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह कुल आवंटन का बड़ा हिस्सा है।
इसके अलावा:
- इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों के लिए 16 करोड़ रुपये की सब्सिडी
- गौशालाओं, पांजरापोल और शैक्षणिक संस्थानों में बायोगैस प्लांट हेतु 12 करोड़ रुपये
- स्कूलों में जलवायु शिक्षा के लिए 9 करोड़ रुपये
- 1200 आधुनिक श्मशान भट्टियों के लिए 7 करोड़ रुपये
- ग्रीन स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन हेतु 5 करोड़ रुपये
का प्रावधान किया गया है।
गुजरात का बढ़ता कार्बन उत्सर्जन
राज्य सरकार द्वारा तैयार ग्रीनहाउस गैस इन्वेंट्री के अनुसार गुजरात का कुल कार्बन फुटप्रिंट वर्ष 2023 में लगभग 261 मिलियन टन CO₂e आंका गया है। यह भारत के कुल उत्सर्जन का लगभग 9.5 से 10 प्रतिशत माना जाता है।
राज्य में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन लगभग 3.66 टन CO₂e है तथा 2005 से 2023 के बीच उत्सर्जन में औसतन 4.29 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई।
सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले क्षेत्र:
- बिजली उत्पादन – 24.66%
- औद्योगिक ऊर्जा उपयोग – 17.40%
- सड़क परिवहन – 10 से 13%
- पेट्रोकेमिकल और रिफाइनरी उद्योग
- सीमेंट और रासायनिक उद्योग
पांच जिले बन गए प्रमुख उत्सर्जन केंद्र
राज्य के कुल उत्सर्जन का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ पांच जिलों से आता है।
| जिला | उत्सर्जन में हिस्सा |
|---|---|
| कच्छ | 17.8% |
| जामनगर | 13.13% |
| सूरत | 10.57% |
| खेड़ा | 8.44% |
| भरूच | 7.97% |
कच्छ में बंदरगाह, कोयला आधारित बिजली संयंत्र, खनन और भारी उद्योग उत्सर्जन के मुख्य स्रोत हैं। जामनगर में विशाल रिफाइनरी परिसर प्रमुख कारण है जबकि सूरत, भरूच और खेड़ा में औद्योगिक गतिविधियां प्रमुख भूमिका निभाती हैं।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ता आर्थिक जोखिम
विश्लेषणों के अनुसार गुजरात को जलवायु परिवर्तन से हर वर्ष 30 हजार करोड़ से 1 लाख करोड़ रुपये तक का आर्थिक जोखिम हो सकता है।
2001 से 2025 के बीच:
- चक्रवातों से 30,000–45,000 करोड़ रुपये
- बाढ़ और अतिवृष्टि से 45,000–70,000 करोड़ रुपये
- सूखे से 20,000–35,000 करोड़ रुपये
- हीटवेव से 5,000–15,000 करोड़ रुपये
के नुकसान का अनुमान लगाया गया है।
कुल अनुमानित नुकसान 1 लाख करोड़ से 1.6 लाख करोड़ रुपये के बीच माना जाता है।
बढ़ती गर्मी और बदलता मौसम
जलवायु परिवर्तन का सबसे स्पष्ट प्रभाव गुजरात में बढ़ती गर्मी के रूप में दिखाई दे रहा है।
अहमदाबाद, राजकोट, कच्छ और सौराष्ट्र में लंबे और अधिक तीव्र हीटवेव दर्ज किए जा रहे हैं। गर्म दिनों के साथ गर्म रातों की संख्या भी बढ़ रही है।
इसके परिणामस्वरूप:
- हीट स्ट्रोक के मामले बढ़ रहे हैं
- बिजली की मांग में वृद्धि हो रही है
- एयर कंडीशनर पर निर्भरता बढ़ रही है
- कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहा है
समुद्री तटों पर बढ़ता खतरा
कच्छ, भरूच, भावनगर, सूरत, वलसाड और पोरबंदर जैसे तटीय जिलों में समुद्री जल का अतिक्रमण, तटीय कटाव और भूमि की लवणता बढ़ने की समस्या सामने आ रही है।
मैंग्रोव और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर भी दबाव बढ़ा है। दूसरी ओर दक्षिण गुजरात में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है।
वाहनों से बढ़ रहा कार्बन
सड़क परिवहन गुजरात के प्रमुख उत्सर्जन स्रोतों में शामिल है।
वर्ष 2026 तक राज्य में लगभग 53 लाख कारें और जीपें दर्ज होने का अनुमान है।
एक सामान्य कार सालाना लगभग 2 से 2.5 टन CO₂ उत्सर्जित करती है। इस आधार पर केवल कारों से ही लगभग 1.16 करोड़ टन CO₂ प्रति वर्ष उत्सर्जित हो सकता है।
इसके अलावा:
- मालवाहक ट्रक और वाणिज्यिक वाहन – 1.26 करोड़ टन
- कारें – 1.09 करोड़ टन
- दोपहिया वाहन – 86 लाख टन
- ट्रैक्टर – 34 लाख टन
- ऑटो रिक्शा – 17 लाख टन
कार्बन उत्सर्जन में योगदान दे सकते हैं।
सवाल बना हुआ है
गुजरात ने देश का पहला क्लाइमेट चेंज विभाग स्थापित कर एक महत्वपूर्ण पहल अवश्य की थी, लेकिन बढ़ते कार्बन उत्सर्जन, औद्योगिक विस्तार, वाहनों की बढ़ती संख्या और जलवायु आपदाओं के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या मौजूदा संस्थागत ढांचा और बजट राज्य को भविष्य की जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त है?
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