गुजरात में जासूसी: फोन टैपिंग से AI निगरानी तक का सफर

गुजरात में फोन सर्विलांस से AI इंटेलिजेंस तक: 25 वर्षों में निगरानी तंत्र का बढ़ता दायरा

दिलीप पटेल

11 जून, 2026, अहमदाबाद

गुजरात में साइबर अपराधों के खिलाफ कार्रवाई, डिजिटल इंटेलिजेंस और एआई (AI) आधारित पुलिसिंग की बढ़ती व्यवस्थाओं के बीच एक बार फिर फोन सर्विलांस और सरकारी निगरानी को लेकर पुरानी बहसें जीवंत हो गई हैं। पिछले 25 वर्षों में गुजरात में मोबाइल सर्विलांस, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) विश्लेषण, डिजिटल फोरेंसिक और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मॉनिटरिंग तक का एक लंबा सफर तय किया गया है।

राज्य में विभिन्न अवधियों के दौरान कांग्रेस, भाजपा के बागी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा फोन टैपिंग और निगरानी के आरोप लगाए गए थे। हालांकि, ऐसे कई आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी, फिर भी सर्विलांस का मुद्दा लगातार एक राजनीतिक विषय बना रहा है।

गोवर्धन झड़फिया से शुरू हुई बहस

वर्ष 2004 में तत्कालीन गृह राज्य मंत्री गोवर्धन झड़फिया ने विधानसभा में अपने भाषण के दौरान आरोप लगाया था कि उनका फोन पुलिस की निगरानी में रखा गया था। पूर्व मंत्री हरेन पंड्या ने भी खुद पर निगरानी रखे जाने की शिकायत की थी। इसके बाद समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने फोन टैपिंग और फोन सर्विलांस के आरोप लगाए।

बाद के वर्षों में, कांग्रेस नेताओं अर्जुन मोढवाडिया और परेश धानाणी सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने भी सरकार पर फोन सर्विलांस के जरिए राजनीतिक दबाव बनाने का आरोप लगाया।

93 हजार फोन नंबरों का विवाद

2013 में गुजरात पुलिस के तत्कालीन प्रमुख अमिताभ पाठक ने आदेश दिया था कि किसी भी फोन नंबर को सर्विलांस पर रखने के लिए टेलीकॉम कंपनी के पास आवेदन करने वाले अधिकारी कम से कम एसपी (SP) स्तर के होने चाहिए।

उसी अवधि के दौरान, यह जानकारी सामने आई थी कि राज्य में 90 दिनों के भीतर लगभग 93,000 फोन नंबरों के सीडीआर (Call Detail Records) प्राप्त किए गए थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह 93,000 का आंकड़ा फोन टैपिंग का नहीं, बल्कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड प्राप्त करने के मामलों का था। सीडीआर से यह जानकारी मिलती है कि कॉल किसे किया गया, कब किया गया और किस टॉवर से किया गया, लेकिन इसमें बातचीत की रिकॉर्डिंग नहीं मिलती।

स्नूपिंग केस और राजनीतिक विवाद

गुजरात के चर्चित “स्नूपिंग केस” ने भी देशव्यापी बहस छेड़ दी थी। इस मामले में एक युवती पर निगरानी रखने के आरोप सामने आए थे। तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह और कुछ पुलिस अधिकारियों के नाम चर्चा में आए थे।

हालांकि इस मामले में कई जांचें और राजनीतिक विवाद हुए, लेकिन कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया। 9 जून 2013 को पूर्व आईपीएस अधिकारी जी.एल. सिंघल ने जांच एजेंसियों को कुछ रिकॉर्डिंग्स और दस्तावेज सौंपे थे। इसके बाद यह पूरा मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया था।

सर्विलांस टेक्नोलॉजी का विकास

गुजरात में इलेक्ट्रॉनिक निगरानी व्यवस्था लगातार बदलती रही है:

  • 2001: पुलिस मुख्य रूप से बेसिक सीडीआर (CDR) पर निर्भर थी।

  • 2005: आईएमईआई (IMEI) ट्रैकिंग का उपयोग शुरू हुआ।

  • 2008: अहमदाबाद सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद हजारों मोबाइल कनेक्शनों के सीडीआर और आईएमईआई विश्लेषण का व्यापक उपयोग हुआ।

  • 2010 के बाद: केंद्रीय निगरानी प्रणाली (CMS) का युग शुरू हुआ।

  • 2015: सोशल मीडिया इंटेलिजेंस को जोड़ा गया।

  • 2018: डिजिटल फोरेंसिक लैब और साइबर क्राइम पुलिस स्टेशनों की क्षमता बढ़ाई गई।

  • 2020 के बाद: यूपीआई (UPI) और ऑनलाइन फ्रॉड ट्रैकिंग पर जोर दिया गया।

  • 2023 से: एआई (AI) आधारित साइबर विश्लेषण की शुरुआत हुई।

  • 2025-26: क्रिप्टो ट्रांजैक्शन और डार्क वेब इंटेलिजेंस जैसे नए क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया।

साइबर युग की नई व्यवस्था

राज्य की क्राइम ब्रांच में 24×7 साइबर सेल और राज्य के विभिन्न रेंजों में साइबर सेल सक्रिय हैं। साइबर अपराधों से लड़ने के लिए सैकड़ों अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति की गई है।

2018 में अहमदाबाद, वडोदरा, राजकोट और सूरत में विशेष साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया गया था। इसके बाद हर साल साइबर जांच की क्षमता में वृद्धि की गई है। हाल ही में ‘साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (Cyber Centre of Excellence) ने देशव्यापी साइबर फ्रॉड नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करते हुए करोड़ों रुपये के घोटालों का भंडाफोड़ किया है।

स्मार्टफोन और डिजिटल जानकारी

केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि कानूनी प्रक्रिया और निर्धारित मंजूरियों के तहत जांच एजेंसियां डिजिटल संचार और कंप्यूटर आधारित जानकारी प्राप्त करने की कार्रवाई कर सकती हैं।

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने संसद में कहा था कि कानून के अनुसार केंद्र और राज्य सरकारों को एक निश्चित प्रक्रिया के तहत डिजिटल संचार और सूचनाओं को इंटरसेप्ट करने का अधिकार है। लेकिन साथ ही, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया था कि किसी भी एजेंसी को अनियंत्रित या सर्वव्यापी जासूसी की अनुमति नहीं दी गई है और हर मामले की समीक्षा के लिए प्रक्रियाएं तय की गई हैं।

पेगासस से एआई (AI) तक

पेगासस स्पाइवेयर को लेकर हुए अंतरराष्ट्रीय विवादों ने भी डिजिटल गोपनीयता की बहस को तेज कर दिया था। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर मोबाइल उपकरणों में घुसकर कॉल, मैसेज, ईमेल, लोकेशन और अन्य डिजिटल जानकारी तक पहुंच सकते हैं। भारत में भी पेगासस को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस हुई थी, हालांकि कई मुद्दों पर मतभेद अब भी बरकरार हैं।

सुरक्षा और गोपनीयता के बीच संतुलन

एक तरफ आतंकवाद, ड्रग्स तस्करी, साइबर फ्रॉड और संगठित अपराधों से लड़ने के लिए आधुनिक डिजिटल इंटेलिजेंस आवश्यक हो गई है। दूसरी तरफ, नागरिकों की गोपनीयता (प्राइवेसी), पारदर्शिता और जवाबदेही के सवाल भी अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं।

गुजरात में 2001 के बेसिक सीडीआर से शुरू हुआ सफर अब एआई आधारित इंटेलिजेंस, डेटा फ्यूजन और डार्क वेब मॉनिटरिंग तक पहुंच गया है। आने वाले वर्षों में सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया रखा जाता है, यह राज्य के डिजिटल गवर्नेंस के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।