गुजरात: दूधसागर डेयरी ने उपभोक्ताओं पर बढ़ाया बोझ, किसानों को नहीं मिला उचित मूल्य

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₹9,020 करोड़ का कारोबार, फिर भी दूध के दाम पर नाराज़ पशुपालक: मेहसाणा से दहेगाम तक उठे सवाल

11 जून 2026

दिलीप पटेल
अहमदाबाद

उत्तर गुजरात की सबसे बड़ी सहकारी दुग्ध संस्था और देश की अग्रणी डेयरियों में शामिल दूधसागर डेयरी (Mehsana District Co-operative Milk Producers’ Union Ltd.) का कारोबार वर्ष 2025-26 में लगभग ₹9,020 करोड़ तक पहुंच गया है। डेयरी से 4.7 लाख से अधिक दुग्ध उत्पादक किसान जुड़े हुए हैं, जबकि कुल सदस्य संख्या 10 लाख से अधिक बताई जाती है।

इसके बावजूद पिछले एक वर्ष के दौरान मेहसाणा, पाटण, गांधीनगर और आसपास के क्षेत्रों में दूध उत्पादक पशुपालकों ने दूध खरीद मूल्य, बढ़ती पशु-चारा लागत और लाभ के वितरण को लेकर विरोध प्रदर्शन किए हैं।

सवाल यह उठ रहा है कि हजारों करोड़ रुपये के कारोबार वाली सहकारी डेयरी और लाखों किसानों के बीच मूल्य को लेकर असंतोष क्यों पैदा हुआ?

दूधसागर डेयरी का बढ़ता विस्तार

दूधसागर डेयरी उत्तर गुजरात की सबसे बड़ी दुग्ध सहकारी संस्था मानी जाती है।

वर्ष 2024-25 में डेयरी का औसत दैनिक दूध संग्रहण 34.88 लाख लीटर था, जो 2025-26 में बढ़कर 36.34 लाख लीटर प्रतिदिन हो गया।

डेयरी वर्तमान में मेहसाणा, पाटण और गांधीनगर के अलावा अन्य राज्यों से भी दूध खरीद रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार गुजरात के बाहर लगभग 5 लाख किसानों के नेटवर्क से प्रतिदिन करीब 10 लाख किलोग्राम दूध खरीदा जाता है।

डेयरी से 1,250 से अधिक ग्राम दुग्ध सहकारी समितियां जुड़ी हुई हैं।

किसान क्यों नाराज़ हुए?

पशुपालकों का मुख्य आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में पशु आहार, चारा, दवाइयों, बिजली, मजदूरी और डीजल की लागत में लगातार वृद्धि हुई है, लेकिन दूध के खरीद मूल्य में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई।

किसानों की प्रमुख शिकायतें हैं:

  • दूध खरीद मूल्य उत्पादन लागत की तुलना में कम है।
  • पशु आहार की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है।
  • हरे चारे और सूखे चारे का खर्च बढ़ गया है।
  • बिजली और डीजल महंगे हुए हैं।
  • डेयरी के लाभ का बड़ा हिस्सा किसानों तक नहीं पहुंच रहा।
  • अमूल और बनास डेयरी जैसी संस्थाएं अधिक लाभ प्रदान करती हैं।

हरिज सम्मेलन में असंतोष

पाटण जिले के हरिज में आयोजित पशुपालक सम्मेलन के दौरान किसानों ने खुले तौर पर दूध के दाम बढ़ाने की मांग की।

सम्मेलन में कई पशुपालकों ने डेयरी प्रबंधन और मूल्य निर्धारण नीति के खिलाफ नाराजगी जताई।

उनका कहना था कि बढ़ती लागत के कारण पशुपालन अब कम लाभदायक होता जा रहा है और छोटे उत्पादकों के लिए टिके रहना कठिन हो रहा है।

दहेगाम में दूध बहाकर विरोध

गांधीनगर जिले के दहेगाम सहित कई क्षेत्रों में पशुपालकों ने दूध बहाकर विरोध प्रदर्शन किया।

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि डेयरी का कारोबार और आय बढ़ रही है, लेकिन उत्पादकों को उसका उचित लाभ नहीं मिल रहा।

इन विरोध प्रदर्शनों के बाद दूधसागर डेयरी पर मूल्य बढ़ाने का दबाव बढ़ा।

विरोध के बाद क्या हुआ?

पशुपालकों के दबाव के बाद डेयरी बोर्ड ने दूध खरीद मूल्य में वृद्धि की घोषणा की।

पहले किसानों को ₹830 प्रति किलोग्राम फैट के हिसाब से भुगतान किया जाता था। बाद में इसमें ₹25 की वृद्धि कर इसे ₹855 प्रति किलोग्राम फैट कर दिया गया।

इसके साथ पहली बार SNF (Solid Non-Fat) आधारित अतिरिक्त भुगतान की भी घोषणा की गई।

डेयरी प्रबंधन का कहना है कि इस निर्णय से किसानों की आय बढ़ेगी और उत्पादन को प्रोत्साहन मिलेगा।

क्या किसान संतुष्ट हैं?

मूल्य वृद्धि के बावजूद सभी पशुपालक पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं।

कई किसान नेताओं का कहना है कि पिछले दो वर्षों में पशु आहार और चारे की लागत 25 से 40 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है, जबकि दूध मूल्य में हुई वृद्धि पर्याप्त नहीं है।

उनका मानना है कि मूल्य निर्धारण में उत्पादन लागत और महंगाई को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।

अन्य डेयरियों से तुलना

गुजरात की प्रमुख डेयरियों के बीच किसानों को मिलने वाले लाभ की तुलना भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

  • अमूल डेयरी (आणंद) ने 2025-26 के लिए लगभग ₹1,035 प्रति किलोग्राम फैट का अंतिम मूल्य घोषित किया था।
  • बनास डेयरी ने उत्पादकों और समितियों को मिलाकर लगभग ₹2,910 करोड़ का भुगतान और बोनस वितरित किया।
  • साबर डेयरी में भी बोनस के मुद्दे पर किसानों का विरोध देखा गया।

इसी कारण दूधसागर डेयरी के किसान भी अधिक लाभ और बोनस की मांग कर रहे हैं।

आगे की राह

दूधसागर डेयरी ने मूल्य वृद्धि करके किसानों के असंतोष को कुछ हद तक कम करने का प्रयास किया है, लेकिन उत्पादन लागत और खरीद मूल्य के बीच का अंतर अभी भी बहस का विषय बना हुआ है।

एक ओर डेयरी का कारोबार ₹9,020 करोड़ तक पहुंच गया है, वहीं दूसरी ओर पशुपालक बेहतर मूल्य, अधिक बोनस और लाभ के न्यायसंगत वितरण की मांग कर रहे हैं।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि उत्तर गुजरात की दुग्ध अर्थव्यवस्था मजबूत है, लेकिन उसकी मजबूती का लाभ किसानों तक कितना पहुंचता है, यह सवाल अभी भी चर्चा के केंद्र में है।