मोटा दहिंसरा में GETCO की 132 केवी लाइन को लेकर विवाद: रूट परिवर्तन, कंपनी की आपत्तियां और मुआवजे पर किसानों के आरोप
मोरबी, 11 जून 2026: मोरबी जिले के मोटा दहिंसरा गांव में गुजरात एनर्जी ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन (GETCO) द्वारा स्थापित 132 केवी ट्रांसमिशन लाइन और सबस्टेशन को लेकर वर्षों पुराना विवाद एक बार फिर चर्चा में है। उपलब्ध दस्तावेजों, कंपनी की आपत्तियों और स्थानीय भूमि मालिकों के आरोपों ने पूरे मामले में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
दस्तावेजों के अनुसार GETCO ने प्रस्तावित मोटा दहिंसरा सबस्टेशन को बिजली आपूर्ति देने के लिए वांकानेर–वरसामेडी डबल सर्किट लाइन के LILO (लूप-इन लूप-आउट) के तहत नई ट्रांसमिशन लाइन की योजना बनाई थी। मूल सर्वेक्षण के बाद संशोधित रूट को मंजूरी दी गई, जिससे लाइन की लंबाई लगभग 79 मीटर बढ़ गई और तीन नए टावर स्थान जोड़े गए। इसके साथ ही चार 220 केवी एंगल टावर प्रस्तावित किए गए थे।
दस्तावेजों में उल्लेख है कि सड़क, रेलवे, नदी तथा अन्य संरचनाओं के साथ आवश्यक सुरक्षा दूरी बनाए रखने के लिए रूट में बदलाव किया गया। वन विभाग, रेलवे और राजमार्ग प्राधिकरणों से आवश्यक अनुमति प्राप्त करने का भी उल्लेख किया गया है।
विवाद का एक प्रमुख पहलू DMCC ऑयल टर्मिनल्स (नवलेखी) लिमिटेड की ओर से उठाई गई आपत्ति है। वर्ष 2018 में कंपनी ने GETCO के प्रबंध निदेशक को पत्र लिखकर बताया था कि उसने नवलेखी में प्रस्तावित बहुउद्देश्यीय जेट्टी परियोजना और LPG भंडारण सुविधा के लिए मोटा दहिंसरा में भूमि खरीदी है।
कंपनी ने अपनी भूमि से 132 केवी हाई-टेंशन लाइन गुजरने के प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए वैकल्पिक रूट पर विचार करने की मांग की थी। दस्तावेजों में दर्ज “DMCC Issue” के बाद रूट में बदलाव किए जाने का उल्लेख मिलता है। मूल रूट में वांकानेर दिशा में पांच टावर प्रस्तावित थे, जबकि संशोधित वरसामेडी रूट में टावरों की संख्या बढ़कर सात हो गई। DMCC के सर्वे नंबर 979, 980 और 983 में प्रस्तावित कई टावर स्थलों को भी बदला गया था।
दूसरी ओर, एक स्थानीय भूमि मालिक ने टावर नंबर AP-04 को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि वर्ष 2016 के मूल नक्शे में यह टावर उनकी भूमि में प्रस्तावित नहीं था, लेकिन बाद में वहां टावर स्थापित कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि मुआवजा प्रक्रिया के दौरान गलत हस्ताक्षरों और गलत स्वामित्व रिकॉर्ड का उपयोग किया गया तथा मुआवजे की राशि किसी अन्य व्यक्ति को दे दी गई।
भूमि मालिक का यह भी कहना है कि उन्हें केवल बिजली की तारें गुजरने की जानकारी दी गई थी, लेकिन बाद में स्थल पर पहुंचने पर वहां टावर स्थापित मिला। उनके अनुसार उस समय यह मामला स्थानीय समाचारों में भी प्रकाशित हुआ था।
स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया है कि सबस्टेशन के लिए गौचर भूमि का उपयोग किया गया और परियोजना का मुख्य उद्देश्य औद्योगिक इकाइयों को बिजली आपूर्ति उपलब्ध कराना था। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
मोटा दहिंसरा का यह विवाद अब केवल ट्रांसमिशन लाइन के रूट परिवर्तन तक सीमित नहीं रहा है। यह भूमि अधिकार, मुआवजा व्यवस्था, सरकारी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और प्रभावित भूमि मालिकों के अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल भी खड़े कर रहा है। स्थानीय लोग पूरे मामले की स्वतंत्र जांच और दस्तावेजों की सार्वजनिक समीक्षा की मांग कर रहे हैं।
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