वायर-फ्री शहर, लेकिन जंगलों में केबल और टावरों का जाल: गुजरात के अभयारण्यों में दूरसंचार परियोजनाओं पर उठे सवाल
दिलीप पटेल
अहमदाबाद, 11 जून 2026
गुजरात सरकार एक ओर वर्ष 2030 तक राज्य के सभी शहरों को “वायर-फ्री” बनाने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य के कई अभयारण्यों और वन क्षेत्रों में ऑप्टिकल फाइबर केबल (OFC), मोबाइल टावर और बिजली लाइनों के विस्तार को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
राज्य सरकार ने “गुजरात वायर-फ्री सिटी मिशन” के तहत 17 महानगरपालिकाओं और 151 नगरपालिकाओं में लगभग 24 हजार किलोमीटर ओवरहेड तारों को भूमिगत करने की योजना बनाई है। इस परियोजना के लिए प्रारंभिक रूप से 500 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। सरकार का दावा है कि इससे शहरों की सुंदरता बढ़ेगी, सुरक्षा मजबूत होगी और आधुनिक शहरी बुनियादी ढांचे को बढ़ावा मिलेगा।
लेकिन दूसरी तरफ वन क्षेत्रों में डिजिटल कनेक्टिविटी और बिजली अवसंरचना के विस्तार के लिए अभयारण्यों की भूमि के उपयोग के प्रस्तावों ने पर्यावरणविदों और वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।
अभयारण्यों में केबल और टावरों के 17 प्रमुख प्रस्ताव
गुजरात राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठक में कुल 17 महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर विचार किया गया। इनमें:
- 8 प्रस्ताव ऑप्टिकल फाइबर केबल (OFC) से जुड़े,
- 5 प्रस्ताव मोबाइल टावरों से संबंधित,
- 1 प्रस्ताव विद्युत लाइन का,
- 2 प्रस्ताव सड़क चौड़ीकरण और सुदृढ़ीकरण के,
- तथा 1 प्रस्ताव गिर अभयारण्य की सीमा पुनर्गठन से जुड़ा था।
इन प्रस्तावों का संबंध राज्य के कई संवेदनशील वन्यजीव क्षेत्रों से है, जिनमें:
- घुड़खर अभयारण्य
- नारायण सरोवर अभयारण्य
- कच्छ डेजर्ट अभयारण्य
- बालाराम-अंबाजी अभयारण्य
- गिर अभयारण्य
- जांबुघोड़ा अभयारण्य
- रतनमहल भालू अभयारण्य
- वांसदा राष्ट्रीय उद्यान
शामिल हैं।
जियो, बीएसएनएल और अन्य कंपनियों की योजनाएँ
वन्यजीव बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत प्रस्तावों के अनुसार विभिन्न दूरसंचार कंपनियां जंगल क्षेत्रों में नेटवर्क विस्तार चाहती हैं।
घुड़खर अभयारण्य में BSNL द्वारा 4G संचार सेवाओं के लिए ऑप्टिकल फाइबर लाइन बिछाने का प्रस्ताव रखा गया है।
कच्छ डेजर्ट अभयारण्य में जियो डिजिटल फाइबर द्वारा बालासर से फतेहगढ़ तक लगभग 18.55 किलोमीटर लंबी भूमिगत OFC लाइन बिछाने की योजना प्रस्तुत की गई है।
बालाराम-अंबाजी अभयारण्य में बनासकांठा जिले के चितरासणी और जेठी गांवों के बीच लगभग 2.68 किलोमीटर लंबी फाइबर लाइन प्रस्तावित है।
इसी प्रकार पाटन जिले के सांतलपुर क्षेत्र स्थित घुड़खर अभयारण्य में लगभग 6.03 किलोमीटर लंबी OFC लाइन के लिए आवेदन किया गया है।
वांसदा राष्ट्रीय उद्यान और नारायण सरोवर अभयारण्य में भी डिजिटल कनेक्टिविटी विस्तार के लिए विभिन्न प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए हैं।
गिर अभयारण्य में बिजली लाइन और सड़क विस्तार
गिर अभयारण्य क्षेत्र में पीजीवीसीएल द्वारा 11 केवी भूमिगत बिजली लाइन बिछाने की योजना भी प्रस्तावित की गई है।
इसके अलावा सड़क एवं भवन विभाग ने गिर क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण और सड़क सुदृढ़ीकरण के लिए भूमि उपयोग की अनुमति मांगी है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परियोजनाओं से जंगलों में मानव गतिविधियों का प्रवेश बढ़ सकता है, जिससे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित होने की आशंका रहती है।
दक्षिण गुजरात में नया अभयारण्य प्रस्तावित
सूरत और तापी वन मंडलों के नियंत्रण वाले लगभग 69,668.51 हेक्टेयर अखंड वन क्षेत्र को नया अभयारण्य घोषित करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।
यदि यह प्रस्ताव स्वीकृत होता है तो दक्षिण गुजरात में वन्यजीव संरक्षण को नया आधार मिलेगा।
गिर अभयारण्य की सीमाओं का पुनर्गठन
केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा गिर अभयारण्य की सीमाओं के पुनर्गठन की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।
प्रस्ताव के अनुसार 11 फॉरेस्ट सेटलमेंट गांवों को अभयारण्य क्षेत्र से बाहर किया जाएगा, जिनमें:
- हंसापुर
- साजिया
- अमृतवेल
- शिरवण
- भायाधर
- भाखा
- बेटी थोरडी
- झांखिया
- जसाधार
- चिखलकुबा
- कोठारिया
शामिल हैं।
इन गांवों का कुल क्षेत्रफल 1,932.29 हेक्टेयर है।
इसके बदले 1,949.34 हेक्टेयर नया क्षेत्र अभयारण्य में शामिल किया जाएगा, जिसमें पिच्छावी, हरमडिया, घांटवड, बामणासा, मालणका, अंबाला, राणीधार, मुंडिया रवाणी और गिर गढ़ड़ा क्षेत्र शामिल हैं।
इस पुनर्गठन के बाद गिर अभयारण्य के क्षेत्रफल में लगभग 17 हेक्टेयर की शुद्ध वृद्धि होगी।
सरकार का दावा है कि इससे वर्षों से लंबित भूमि विवादों का समाधान होगा और फॉरेस्ट सेटलमेंट गांवों को राजस्व गांव का दर्जा मिल सकेगा।
तेंदुओं की संख्या में 63 प्रतिशत वृद्धि
वन विभाग के अनुसार गुजरात में तेंदुओं की संख्या बढ़कर 2,274 हो गई है, जो पिछली गणना की तुलना में 63 प्रतिशत अधिक है।
हालांकि इसके साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ी हैं।
वर्ष 2022-23
- मानव मृत्यु: 26
- घायल व्यक्ति: 156
- पशुहानि: 6,597
वर्ष 2023-24
- मानव मृत्यु: 29
- घायल व्यक्ति: 97
- पशुहानि: 2,178
विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों में बढ़ती आधारभूत संरचना और मानव गतिविधियां भी वन्यजीवों के व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं।
पर्यावरण पर संभावित प्रभाव
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार भूमिगत केबल परियोजनाएं सतह पर कम दिखाई देती हैं, लेकिन इनके लिए खुदाई, भारी मशीनों का उपयोग और नई पहुंच सड़कों की आवश्यकता होती है।
इसके कारण:
- वनस्पति को नुकसान हो सकता है,
- पेड़ों की जड़ों पर असर पड़ सकता है,
- जंगलों का विखंडन हो सकता है,
- वन्यजीव गलियारों में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
मोबाइल टावरों के लिए भूमि साफ करनी पड़ती है और रखरखाव के लिए नियमित वाहन आवाजाही भी बढ़ती है।
पक्षियों और वन्यजीवों पर प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि ऊंचे टावर प्रवासी पक्षियों के लिए टकराव का खतरा बढ़ा सकते हैं।
मोबाइल टावरों से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन (EMF) को लेकर भी बहस जारी है।
कुछ अध्ययनों में पक्षियों की दिशा पहचानने की क्षमता, मधुमक्खियों के व्यवहार और चमगादड़ों पर संभावित प्रभाव के संकेत मिले हैं।
हालांकि शेर, बाघ, तेंदुआ और भालू जैसे बड़े स्तनधारियों पर मोबाइल टावर रेडिएशन के गंभीर प्रभावों के मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं हैं।
2015 से 2025 के बीच 41 टावर प्रस्ताव
उपलब्ध जानकारी के अनुसार 2015 से 2025 के बीच विभिन्न कंपनियों द्वारा अभयारण्य क्षेत्रों में कुल 41 मोबाइल टावरों के प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए थे।
इनमें से 34 प्रस्ताव केवल गिर क्षेत्र से संबंधित थे।
दिसंबर 2021 में गिर, गिरनार, शूलपाणेश्वर और रतनमहल अभयारण्य क्षेत्रों में टावर और OFC परियोजनाओं के कुछ प्रस्ताव बाद में स्थगित कर दिए गए थे।
विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती
गुजरात एक ओर आधुनिक डिजिटल कनेक्टिविटी और वायर-फ्री शहरों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन की चुनौतियां भी सामने हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि दूरसंचार और डिजिटल सेवाओं का विस्तार आवश्यक है, लेकिन संवेदनशील वन क्षेत्रों में किसी भी परियोजना को लागू करने से पहले विस्तृत पर्यावरणीय मूल्यांकन, वैज्ञानिक अध्ययन और सख्त निगरानी अनिवार्य होनी चाहिए।
आने वाले वर्षों में गुजरात के लिए सबसे बड़ी चुनौती विकास और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी।
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